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dhari devi temple story

आख़िर क्यों काटा धारी देवी के भाइयों ने उनका सर – Unheard history Of Dhari Devi

Unheard history Of Dhari Devi

दोस्तों केदारनाथ और  बद्रीनाथ  जाते  वक़्त  श्रीनगर  से करीब 14  KM  दूर माँ धारी का एक सुन्दर सा मंदिर आता है जिसको आज देश का हर बच्चा  बच्चा जानता है , माँ धारी देवी जिसे चार धाम की रक्षक देवी मानी  जाती है , बद्रीनाथ और केदारनाथ मोटर मार्ग पर माँ अलकनंदा नदी के तट पर बसा माँ धारी देवी का ये अद्भुद मंदिर न सिर्फ देखने में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है बल्कि श्रद्धालुओ की आस्था का अद्भुद केंद्र है , यहाँ माँ की शक्तिया अद्भुद है जिसके साक्षी यहाँ आने वाले श्रद्धालु है , जो भी यहाँ आया उसने माँ की शक्तियों के दर्शन किये , माँ धारी देवी अपने भक्तो को एक दिन में तीन रूप में दर्शन देती है , सुबह एक छोटी बच्ची के रूप में , दिन में महिला रूप में और शाम को  वृद्धा अवस्था में , 

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ये तो सभी जानते है की 2013 में केदारनाथ में एक भीषण आपदा  आई थी जब चौराबाड़ी ताल फटने से केदारनाथ में बाद आ गयी जिसमे लाखो श्रद्धालुओं की जान गयी और साथ ही मन्दाकिनी और अलकनंदा नदी के तट पर बसे गांव भी तबाह हो गए , जिसका असर श्रीनगर तक देखने को मिला, कहते है माँ धारी देवी की मूर्ती से छेड़छाड़ की वजह से ये प्रकोप आया , चलिए विस्तार से बताते है ,

श्रीनगर में विद्युत परियोजना के तहत  श्रीनगर में डैम  निर्माण कार्य होना था डैम बनने से अलकनंदा पानी का स्तर ऊपर आता तो धारी देवी के मंदिर को खतरा हो जाता तो सरकार ने मंदिर को वहां से हटा कर पहाड़ी  की दूसरी ओर स्थापित करने की बात राखी जिसका विरोध भी हुआ लेकिन जैसे ही मूर्ती को हटा कर ले जाया गया उसके दो घंटे के भीतर ही केदारनाथ में बादल फटा जिसकी वजह से बहोत ज्यादा  तबाही हुई , कहते है माँ चारो  धामों  की रक्षक है और वहां छेड़ छाड़   की तो और ज्यादा तबाही होगी   उसके बाद मूर्ती को वही  स्थापित किया  गया लेकिन बाद ने पूरे  मंदिर को छतिग्रस्त  कर दिया  था , फिर  उस  मंदिर का निर्माण फिर  से हुआ और अब  जो मंदिर बना  है वो  पहले  से ज्यादा सुन्दर दिखता  है 

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Dhari Devi Temple Story

ये बार तो सोचने वाली है की उत्तराखंड में अधिकतर देविओ के मंदिर पहाड़ की चोटिओ पर है तो माँ धारी देवी का मंदिर नदी के बीच कैसे इसके पीछे भी एक अधभुद कहानी है कहते है दोस्तों लगभग 100  से 150  साल पहले यहाँ एक छोटी बच्ची  गला बहते हुए आया था  , इस नदी के पास धारी  गांव है जहाँ एक उसी गांव के व्यक्ति ने उस  गले को देखा , उसे लगा नदी में बहते हुए कोई आ रहा है उसे बचाना चाहिए लेकिन नदी का बहाव इतना तेज़ था की वो व्यक्ति वहां तक जा नहीं पाया तभी एक आकाशवाणी हुई की तुम मुझे बचाओ तुमको कुछ नहीं होगा , तुम आगे बड़ो , आदमी ये सुन कर हैरान हो गया और डरते डरते कदम आगे बढ़ाने लगा और जैसे जैसे वो कदम आगे बढ़ाता रहा उसने पैरो के नीचे सीडिया बनती रही , और जैसे ही वो सर के पास पहुंचा तो देखा ये तो कटा हुआ सर है और इस सर से आवाज़ कैसे आ सकती है ,

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वो काफी दर गया तब उस बच्ची के ने उस व्यक्ति को बताया की वो यहाँ कैसे पहुंची , उसने बताया की वो 7 भाइयो की इकलौता बेहेन थी जिसे उसके भाई पसंद नहीं करते थे क्युकी उसकी कुंडली में लिखा की ये छोटी बच्ची उनकी मृत्यु का कारन बनेगी , जिसकी वजह से उसके भाइयो की नफरत बढ़ने लगी , धीरे धीरे 7 में से 5 भाइयो की अकस्मात् मृत्यु हो जाती है जिसे देख कर २ भाई और भी ज्यादा दर जाते है , एक दिन दोनों भाइयो और उनकी पत्नियों में मिलकर एक योजना बनाई की इसका गला काट कर अलकनंदा नदी में बहा देते है जिस से उनकी मृत्यु टल जाएगी , और एक रात उन्होंने ऐसा कर दिया , और उस बच्ची का गला बहते हुए यहाँ आ पहुंचा , 

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उस व्यक्ति ने पूछा में आपके लिए क्या कर सकता हु तब माँ ने बताया तुम मेरा सर नदी के किनारे पत्थर पर रख दो आज से में तुम्हारे गांव की रक्षा करुँगी तब उस व्यक्ति ने उस सर को एक पत्थर की चट्टान पर रख दिया और देखते ही देखते वो सर एक विशाल पठार में बदल गया।  

और तब से वो पठत धारी देवी के नाम से जाना जाने लगा , और आज भी वो पत्थर उसी चट्टान पर स्थित है और अपने मूल रूप में देवी अपने भक्तो  की प्रतीक्षा में है 

लोककथाओं के अनुसार धारी देवी की शक्ति समय के साथ अपना स्वरूप बदलती है। लोग मानते हैं कि सुबह जब वातावरण शांत और ऊर्जा नई होती है, तब देवी का रूप एक मासूम कन्या जैसा महसूस होता है। दोपहर तक वही शक्ति युवा और प्रखर रूप में दिखाई देती है, जबकि शाम को वह अनुभव वृद्धा स्वरूप की गंभीरता और ज्ञान से जुड़ जाता है। यह परिवर्तन मूर्ति के भौतिक रूप से नहीं, बल्कि आस्था और अनुभूति के स्तर पर बताया जाता है।

इस कथा का गहरा संदेश यह है कि शक्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती, बल्कि समय, स्थिति और ऊर्जा के साथ उसका स्वरूप बदलता है। इसे देवी के जाग्रत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। भक्तों के लिए यह भावना और मजबूत हो जाती है कि वे किसी साधारण मूर्ति के नहीं, बल्कि जीवंत और संवेदनशील शक्ति के दर्शन कर रहे हैं।

धारी देवी की यह मान्यता मंदिर को अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाती है। एक तरफ यह श्रद्धा का विषय है, दूसरी तरफ लोककथा, रहस्य और आध्यात्मिकता का सुंदर संगम भी है। यही वजह है कि धारी देवी का नाम सुनते ही लोगों के मन में केवल मंदिर नहीं, बल्कि एक चमत्कारी और जीवंत शक्ति की छवि बनती है।

कैसे जाए धारी देवी – How To Reach Dhari Devi

धारी देवी जाने के लिए आपको सबसे पहले ऋषिकेश आना पड़ता है , अगर आप बस से है तो आपको ऋषिकेश से श्रीनगर की सीधी बस मिल जाएगी  और श्री नगर से धारी देवी की दूरी मात्र १४ KM है जाना के लिए Public Transport आसानी से उपलब्ध है 

और अगर आप बुजुर्ग है  और ऐसे तीर्थो पर जाना पसंद है तो आप सीधा 9410386422 नो पर कॉल करके पूरा पैकेज बुक करवा सकते है जो आपके लिए किफायती भी होगा और आरामदायक भी 

धारी देवी मंदिर उत्तराखंड की धार्मिक परंपरा, लोककथाओं और चमत्कारी मान्यताओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इसकी कहानी सिर्फ एक मंदिर की नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध की कहानी है।

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